मुर्शिदाबाद में सुनियोजित हिंसा: हिंदुओं को बनाया गया निशाना, TMC नेताओं की भूमिका उजागर – हाई कोर्ट कमेटी की रिपोर्ट में खुलासा
पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद ज़िले में अप्रैल 2025 में घटित हिंसा को लेकर कलकत्ता हाई कोर्ट द्वारा गठित जाँच समिति की रिपोर्ट ने चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि यह हिंसा सुनियोजित थी, जिसमें सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC) के पार्षद और विधायक की सीधी संलिप्तता थी। हिंदू समुदाय को टारगेट कर उनके घर जलाए गए, मंदिरों को अपवित्र किया गया, और महिलाओं को अपमानित किया गया।
हिंसा की शुरुआत और प्रभावित क्षेत्र
जाँच रिपोर्ट के अनुसार, हिंसा की शुरुआत 11 अप्रैल 2025 को दोपहर 2:30 बजे के बाद हुई और अगले दिन तक जारी रही। इस हिंसा ने बेटबोना, धूलियान, पालपारा, समसेरगंज, हिजलतला, शिउलीतला, डिगरी और घोषपारा जैसे कई इलाकों को अपनी चपेट में लिया। सिर्फ बेटबोना गाँव में 113 घर पूरी तरह बर्बाद हो गए जिन्हें अब फिर से बनाना पड़ेगा।


आग बुझाने से रोकने के लिए काटे पानी के कनेक्शन
हमलावरों ने कपड़ों और संपत्ति को जलाने के बाद सुनिश्चित किया कि पीड़ित आग न बुझा सकें। इसके लिए उन्होंने पानी की पाइपलाइनों को काटा, टैंकों और पंपों को नष्ट कर दिया। मिट्टी का तेल डालकर घरों में आग लगाई गई और महिलाओं के सारे कपड़े जला दिए गए, ताकि उनके पास तन ढकने तक का कुछ न बचे।
प्रत्यक्षदर्शियों और पीड़ितों के बयान
रिपोर्ट में कई पीड़ितों की गवाही दर्ज की गई है:
प्रतिमा मंडल: उनके घर में जिंदा बम मिला, जेवर और फर्नीचर लूटे गए।
प्रशांत और सरस्वती मंडल: उनके वाहन जलाए और लूटे गए।
फूलचंद और पलाश मंडल: पत्नी और बच्चे पर चाकू से हमला हुआ।
परूल दास: उनके परिवार के सदस्यों को अगवा कर लिया गया।
हरगोविंदा दास और चंदन दास: पिता-पुत्र को कुल्हाड़ी से काटकर मार डाला गया, वह भी उनके मुस्लिम पड़ोसियों द्वारा।
कृष्णा चंदा पाल, जय राम पाल, अपुर्बा के.आर. पाल, नबीन चंदा पाल: इन सभी के घरों से लाखों की संपत्ति और नकदी लूट ली गई।
सत्तारूढ़ दल के नेताओं की भूमिका
जाँच में सामने आया कि हिंसा की शुरुआत स्थानीय पार्षद मेहबूब आलम के निर्देश पर हुई। वह खुद हमलावरों के साथ घटनास्थल पर मौजूद था। बाद में स्थानीय विधायक अमीरुल इस्लाम भी वहाँ पहुँचा, और उसने उन हिंदू घरों की पहचान की जो अभी नहीं जले थे – फिर वहाँ भी आगजनी कराई गई। इन नेताओं ने हिंसा को रोकने का कोई प्रयास नहीं किया।
पुलिस की निष्क्रियता
जाँच समिति ने बताया कि हिंसा के दौरान पुलिस ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। पीड़ितों ने पुलिस को बार-बार कॉल किया लेकिन कोई मदद नहीं मिली, जबकि घटनास्थल स्थानीय थाने से केवल 300 मीटर दूर था। रिपोर्ट में इसे “घोर लापरवाही” और “जानबूझकर की गई निष्क्रियता” बताया गया।
लूटपाट, धार्मिक स्थलों पर हमले
घोषपारा में 29 दुकानें जलाई गईं या लूटी गईं। मंदिरों के सामने पेशाब किया गया, हिंदुओं को कलमा पढ़ने के लिए मजबूर किया गया और घरों पर निशान लगाकर उन्हें टारगेट किया गया।
महिलाओं पर अत्याचार और विस्थापन
हिंसा के बाद महिलाएँ डरी हुई हैं और गाँव छोड़कर रिश्तेदारों के यहाँ रहने को मजबूर हैं। उन्हें लगातार धमकियाँ दी जा रही हैं। रिपोर्ट बताती है कि यह हिंसा सिर्फ शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक और सांस्कृतिक आक्रमण भी थी।
निष्कर्ष
कलकत्ता हाई कोर्ट की समिति की रिपोर्ट ने साबित कर दिया है कि मुर्शिदाबाद की हिंसा केवल संयोग नहीं थी, यह एक सोची-समझी रणनीति के तहत की गई सुनियोजित कार्रवाई थी – जिसमें स्थानीय मुस्लिम कट्टरपंथियों के साथ TMC नेताओं और पुलिस की चुप्पी भी शामिल थी।
अब सवाल ये उठता है:
क्या दोषियों को सज़ा मिलेगी? या यह रिपोर्ट भी कई अन्य रिपोर्टों की तरह धूल फाँकती रह जाएगी?
और जो लोग देश में “अभिव्यक्ति की आज़ादी” और “अघोषित आपातकाल” की बातें करते हैं, क्या वे इस पर भी कुछ बोलेंगे?








