रघुपति राघव राजा राम’ पर विवाद क्यों

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रघुपति राघव राजा राम’: कैसे और क्यों जुड़ा इसमें ईश्वर और अल्लाह का नाम? जानें इसके पीछे की पूरी कहानी
रघुपति राघव राजा राम’: कैसे और क्यों जुड़ा इसमें ईश्वर और अल्लाह का नाम? जानें इसके पीछे की पूरी कहानी

महात्मा गांधी के प्रिय भजन ‘रघुपति राघव राजा राम’ पर विवाद क्यों?

‘रघुपति राघव राजा राम, पतित पावन सीता राम, ईश्वर अल्लाह तेरो नाम, सबको सन्मति दे भगवान’—महात्मा गांधी का यह प्रिय भजन एक समय देश की एकता और स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक था। लेकिन हाल के दिनों में इस भजन को लेकर विवाद बढ़ गया है।

रघुपति राघव राजा राम’: कैसे और क्यों जुड़ा इसमें ईश्वर और अल्लाह का नाम? जानें इसके पीछे की पूरी कहानी
रघुपति राघव राजा राम’: कैसे और क्यों जुड़ा इसमें ईश्वर और अल्लाह का नाम? जानें इसके पीछे की पूरी कहानी

भजन का ऐतिहासिक संदर्भ

यह भजन महात्मा गांधी के दांडी मार्च (1930) के दौरान समूह गान और विजय गीत के रूप में प्रसिद्ध हुआ। गांधी ने इसे सार्वभौमिकता और धर्मनिरपेक्षता के साथ प्रस्तुत किया, जिससे यह जन-जन का गीत बन गया। उन्होंने “ईश्वर” के साथ “अल्लाह” शब्द जोड़कर इसे सभी धर्मों के लोगों को एकजुट करने का साधन बनाया।

मूलता को लेकर विवाद

इस भजन की मूल रचना को लेकर विभिन्न दावे हैं:

  1. संत तुलसीदास का दावा:
    कहा जाता है कि तुलसीदास ने यह भजन डाकोर (गुजरात) में रचा था। लेकिन उनके लेखन में ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिलता, और उनकी शैली व भाषा से यह मेल नहीं खाता।
  2. संत लक्ष्मणाचार्य का दावा:
    एक और दावा यह है कि भजन संत लक्ष्मणाचार्य द्वारा रचित “श्री नाम रामायण” का हिस्सा है। इस कृति में रामायण के कांडों को भक्ति पदों में प्रस्तुत किया गया है।

गांधी का योगदान और संशोधन

गांधी ने मूल भजन में बदलाव किए। उन्होंने “ईश्वर-अल्लाह” जैसे शब्द जोड़कर इसे धर्मनिरपेक्षता का स्वरूप दिया। यह बदलाव उनकी “सर्वधर्म समभाव” की नीति का प्रतीक था।

विवाद का कारण

हाल ही में पटना में अटल जयंती समारोह के दौरान इस भजन की एक पंक्ति, “ईश्वर अल्लाह तेरो नाम,” पर विवाद हुआ। भोजपुरी गायिका के गाने पर कार्यक्रम में हंगामा हुआ और इसे धार्मिक भावनाओं से जोड़ा गया। यह घटना दिखाती है कि आज इस भजन को कैसे अलग-अलग नजरिए से देखा जा रहा है।

भजन की धुन और संगीत

आचार्य विष्णु दिगंबर पलुस्कर ने इस भजन को राग मिश्र में संगीतबद्ध किया। यह भजन स्वतंत्रता संग्राम की सभाओं में गाया जाता था और महात्मा गांधी की प्रार्थना सभाओं का अभिन्न हिस्सा बन गया।

फिल्मों में रामधुन

इस भजन को कई फिल्मों में भी प्रमुखता से शामिल किया गया, जैसे:

  • भरत मिलाप (1942)
  • जागृति (1954) – गीत “दे दी हमें आज़ादी”
  • गांधी (1982)
  • लगे रहो मुन्ना भाई (2006)

क्या यह विवाद इस भजन की सार्वभौमिकता को नकारता है, या इसे फिर से समझने की आवश्यकता है? यही आज का सवाल है।

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